कुछ सच्ची और अच्छी बातें | Kuch Sacchi or acchi baaten by Rohit Kumar

By | July 16, 2021

1. डोर लंबी हो इसका मतलब यह नहीं कि पतंग ऊपर तक जाएगी, उड़ाने का तरीका भी आना चाहिए, दौलत ज्यादा का मतलब सफ़ल जीवन नहीं जीने का सलीका भी आना चाहिए |

 

 

2. अच्छा इसलिए ना करो कि बदले में अच्छा मिले, अच्छा इसलिए करो कि किसी और को खुशियां मिले |

 

 

3. नेक नीयत के साथ जो काम किए जाते हैं वे रुकावटों के होते हुए भी सफल होते ही हैं |

 

 

4. माँफी मांगने की शुरुआत में करता हूं, माँफी देने की शुरुआत आप कर दीजिए अपने उलझे हुए रिश्तो को कुछ ऐसे सुलझाइए |

 

 

5. कभी इंसान से जीतने की कोशिश मत करो इंसान को जीतने की कोशिश करो |

 

 

6. ईश्वर ने एक पेड़ के 2 पत्ते भी एक जैसे नहीं बनाए हैं हर एक की अपनी मौलिकता है दूसरों से ईर्ष्या रखकर आगे बढ़ने के बजाय अपनी मौलिकता खोजें इसी में असली आनंद और समाधान है |

 

 

7. प्रार्थना करो केवल इसलिए नहीं कि कुछ जरूरत है बल्कि इसलिए कि हम शुक्रगुजार हैं जो कुछ हमारे पास है |

 

 

8. वजूद सबका अपना है सूर्य के सामने दीपक का ना सही अंधेरे के आगे बहुत कुछ है |

 

 

9. अकड़ और अभिमान एक मानसिक बीमारी है जिसका इलाज कुदरत और समय जरूर करता है |

 

 

10. जिंदगी की बैंक में जब प्यार का बैलेंस कम हो जाता है तब हंसी खुशी के चेक बाउंस होने लगते हैं इसलिए हमेशा अपनों के साथ नज़दीकियां बनाए रखिए और अपनों को प्यार बांटते रहिए |

 

 

11. जब आपसे कोई दो कदम पीछे हटे तो उसे उम्र भर खुश रहने की दुआ देकर चार कदम पीछे हट जाने में ही भलाई है |

 

 

सुंदरकांड के इस प्रसंग को अवश्य पढ़ें!

“मैं न होता, तो क्या होता?”

“अशोक वाटिका” में जिस समय रावण क्रोध में भरकर, तलवार लेकर, सीता माँ को मारने के लिए दौड़ पड़ा, तब हनुमान जी को लगा, कि इसकी तलवार छीन कर, इसका सर काट लेना चाहिये!

किन्तु, अगले ही क्षण, उन्हों ने देखा “मंदोदरी” ने रावण का हाथ पकड़ लिया! यह देखकर वे गदगद हो गये! वे सोचने लगे, यदि मैं आगे बड़ता तो मुझे भ्रम हो जाता कि यदि मै न होता, तो सीता जी को कौन बचाता?

अतः हमको ऐसा ही भ्रम हो जाता है, मैं न होता, तो क्या होता ? परन्तु ये क्या हुआ? सीताजी को बचाने का कार्य प्रभु ने रावण की पत्नी को ही सौंप दिया! तब हनुमान जी समझ गये, कि प्रभु जिससे जो कार्य लेना चाहते हैं, वह उसी से लेते हैं!

आगे चलकर जब “त्रिजटा” ने कहा कि “लंका में बंदर आया हुआ है, और वह लंका जलायेगा!” तो हनुमान जी बड़ी चिंता मे पड़ गये, कि प्रभु ने तो लंका जलाने के लिए कहा ही नहीं है, और त्रिजटा कह रही है कि उन्होंने स्वप्न में देखा है, एक वानर ने लंका जलाई है! अब उन्हें क्या करना चाहिए? जो प्रभु इच्छा!

अब जब रावण के सैनिक तलवार लेकर हनुमान जी को मारने के लिये दौड़े, तो हनुमान ने अपने को बचाने के लिए तनिक भी चेष्टा नहीं की, और जब “विभीषण” ने आकर कहा कि दूत को मारना अनीति है, तो हनुमान जी समझ गये कि मुझे बचाने के लिये प्रभु ने यह उपाय कर दिया है!*

और आश्चर्य की पराकाष्ठा तो तब हुई, जब रावण ने कहा कि बंदर को मारा नहीं जायेगा, पर पूंछ मे कपड़ा लपेट कर, घी डालकर, आग लगाई जाये, तो हनुमान जी सोचने लगे कि लंका वाली त्रिजटा की बात सच थी, वरना लंका को जलाने के लिए मै कहां से घी, तेल, कपड़ा लाता, और कहां आग ढूंढता? पर वह प्रबन्ध भी आपने रावण से करा दिया! जब आप रावण से भी अपना काम करा लेते हैं, तो मुझसे करा लेने में आश्चर्य की क्या बात है।

इसलिये सदैव याद रखें, कि संसार में जो हो रहा है, वह सब ईश्वरीय विधान है! हम और आप तो केवल निमित्त मात्र हैं!
इसीलिये कभी भी ये भ्रम न पालें कि…आज मै न होता, तो क्या होता?

जय श्री राम 

 

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