बुरा इंसान जब अच्छा बन जाता है तो उसके साथ बुरा क्यों होने लगता है ? Gautam Buddha Moral Story in Hindi | Buddhist Story

By | February 15, 2022

भगवान बुद्ध बोल रहे हैं कि शिष्यों बुरे काम छोड़ देने पर भी उसकी बदनामी मिटाई नहीं जा सकती इसीलिए हमें बुरे काम नहीं करने चाहिए | मनुष्य द्वारा किए गए छोटे-छोटे बुरे काम उसका पीछा नहीं छोड़ते | जैसे ऋषि वाल्मीकि जी का प्रारंभिक जीवन उनके परिचय में हमेशा उल्लेखित किया जाता है और इसी से जुड़ी एक कथा तुम्हे और सुनाता हूं |

 

 

 

एक छोटे से कस्बे में पंडित रामानंद शास्त्री रहा करते थे | वो बहुत सदाचारी थे और हर किसी की मदद के लिए हमेशा तैयार रहते थे | आसपास के कई गांवों तक उनकी ख्याति थी | उनका एक पुत्र था जिसका नाम था रामसेवक |

 

 

 

रामसेवक इकलौता होने के कारण बड़ा ही चंचल और नटखट था | पंडित जी की हार्दिक अभिलाषा थी कि उनका बेटा विद्या प्राप्त करके उन्ही की तरह सदाचारी बने और पूजा पंडिताई का काम करे |

 

 

 

लेकिन पिता की आज्ञा के विपरीत लाडला रामसेवक हमेशा शरारते करता रहता था पंडित रामानंद शास्त्री जी उसे समझाने का भरसक प्रयास करते थे लेकिन रामसेवक को बुरे कामों में मजा आता था | अंत में निराश होकर पंडित जी ने रामसेवक को समझाना बंद कर दिया |

 

 

 

जब कभी कोई उनके पुत्र की शिकायत लेकर आता तो पंडित जी अपने घर के मुख्य द्वार पर एक कील गाड़ देते | कुछ ही दिनों में दरवाजा कीलों से भर गया | एक दिन एक अंधा मुसाफिर पंडित जी के पास रोता हुआ आया | पूछने पर उसने बताया कि उनके बेटे रामसेवक ने उसकी लाठी खींच ली और उसकी पोटली कुएं में फेंक दी |

 

 

 

यह सुनकर पंडित जी को बड़ा दुख हुआ | उन्होंने दरवाजे की ओर देखा तो उसमें केवल एक आखरी कील ठोकने के लिए ही जगह बची थी | पंडित जी ने अंधे मुसाफिर से माफी मांग कर उसे रवाना किया और कील तथा हथोड़ा लेकर जैसे ही दरवाज़े पर कील ठोंकनी शुरू की उसी समय रामसेवक वहां आ पहुंचा |

 

 

 

उसने पिता से पूछा पिताजी आप यह क्या कर रहे हैं ?

 

 

 

पंडित जी उदास मन से बोल उठे | मैं तेरे किए गए दुशकर्मों की गिनती कर रहा हूं |

 

 

 

रामसेवक आश्चर्य से दरवाजे पर लगी सभी कीलों को देखने लगा और फिर पूछ बैठा | क्या दरवाजे पर सभी कीले मेरे कारण लगे हैं ?

 

 

 

इस पर दुखी पंडित जी बोल उठे ” हां मेरे नालायक बेटे ”

 

 

 

यह सब कीले तुम्हारे द्वारा किए गए दुषकर्मों का सूचक हैं |

 

 

पंडित जी ने रामसेवक को समझाया | देखो बेटा बुरे कर्मों को छोड़कर परोपकार और सत्कर्म करो | ज्ञान विद्या प्राप्त करो | अब भी अवसर है | नहीं तो शेष जीवन पश्चाताप में बीत जाएगा |

 

 

 

यह सुनकर रामसेवक उदास हो गया उसे अपनी गलती का एहसास हुआ | उसने मन ही मन प्रण किया कि अब वह अच्छे कर्म करेगा | अपने पिता द्वारा बताए गए मार्ग पर चलेगा |

 

 

 

एकाएक उसके व्यवहार में बदलाव आ गया | उसने लोगों को सताना बंद कर दिया और सब की सहायता करने लगा | उसके इस बदले व्यवहार पर पंडित जी खुश रहने लगे | उन्होंने रामसेवक के प्रत्येक अच्छे कर्म से दरवाजे पर लगी एक – एक कील निकालनी शुरू कर दी | धीरे-धीरे सारी कीलें निकल गईं |

 

 

 

एक दिन पंडित जी आंगन में बैठकर धूप सीख रहे थे तभी उन्हें किसी ने बताया कि अभी-अभी रामसेवक ने एक निधन महिला की सहायता की है | इस सूचना पर प्रसन्न होकर पंडित जी ने जैसे ही अंतिम कील निकाली | उसी समय रामसेवक वहां आ पहुंचा | रामसेवक कभी अपने पिता को देखता तो कभी उस दरवाजे को |

 

 

 

उसने कहा पिताजी कील तो सारी निकल गई पर उसके निशान दरवाजे पर सदा के लिए रह गए इसीलिए

 

 

भगवान बुद्ध कहते हैं कि बुरे काम छोड़ देने पर भी उसकी बदनामी मिटाई नहीं जा सकती |

 

 

 

दोस्तों यह कहानी आपको कैसी लगी और इस कहानी से आपने क्या सीखा हमें कमेंट में बताएं और इस वीडियो को लाइक जरूर करें धन्यवाद |

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